आ गयी थी

*कविता*आ गयी थी कदम की छाप बन रही थी सूरज की ताप बढ़ रही थी राह पर कदम बढ़ रही थी ज़िंदगी की पथ ढल रही थी मौसम की चादर ढल गयी थी रंगो की बरसात आ गयी थी ज़िंदगी का मन-मान गयी थी हारी साँसे भी जाग गयी थी धूल की कण उड़ गयी थी वक्त की रण बढ़ गयी थी छाती की… Read more

रश्मि भूमंडल पर

*कविता*रश्मि भूमंडल पर दिनकर की दर्पण आ रही है नीर पर लालिमा दिखा रही है सौंदर्य की मूर्ति बनी है नीर पर पल भर में आ जाती है,चीर कर रश्मि ही भूमंडल को जागाती है वही तो सवेरा बनकर महकाती है छिप जाने पर तिमिर ही लहराती है आ जाने पर ज़िंदगी को सहलाती है कुद… Read more

डैना की गगन

*कविता*डैना की गगन सूर्य की लालिमा खो रही है परिंदो की हालिया सो रही है गगन के साथ लहर रही है पंख फैला कर जी रही है बीहड़ के तन में रह रही हैं कुदरत में कुल जी रही है धरा पर कदम रख रही है उड़ने की डैना रोक रही है धरा पर आना-जाना करती है पंख फैला कर रंग … Read more

प्रेम की रश्मि

*कविता*प्रेम की रश्मि प्रेम की सागर में जो डूब गया  ज़िंदगी साँसो में वह चूब गया मोहब्बत को झुका देती है मजबूरियाँ पलको का नयन बदल देती हैं नजरियाँ प्रेम की लगाव में हम भी डूबे थे वक्त की रफ़्तार में हम भी हारे थे किसी के आधार हम भी जीये थे वक्त क… Read more

घिन की रथ

*कविता*घिन की रथ  मेरी बात कही ना कही होती है शाम होने से रात कही ढलती है घृणा की अग्नि कही तो जलती है मन की चाहत कही तो घटती है जब मनुज पर वक्त की दशा छाती है विनाश काल ही माथे पर मँडराती है ज़िंदगी उसकी काल में नज़र आती है वक्त का आईना उसी को दिखाती है … Read more

*कविता*सोये-सोये है

*कविता*सोये-सोये है बिस्तर पर पड़े हम सो रहे थे स्वप्न की चादर हम खो रहे थे जगत की उक्त में हम रो रहे थे ख्वाबों की छाया पर हम ही थे नज़र की राज़ से बनती जगत देखूँगा स्वप्न की बात से जागती रश्मि लिखूँगा सोयो तन को वसुधा पर छोड़ कर आता हूँ जागे मन को अर्श प… Read more

धीरे-धीरे

*कविता*धीरे-धीरे धीरे-धीरे ही वक्त का डगैरा ढलता है बीत जाने पर लौट कर नही आता है वक्त की छाप ही दोहराती व्यतीत को शोभन ही दिखाती है,अंगो का रंग को ज़िंदगी कुछ बोल कर ही दोहराती है वादे को जोड़ कर,यादों आ जाती है उजाला ही जागाती,वक्त ही दौड़ाती है … Read more