लुप्त-गुप्त

*कविता*लुप्त-गुप्त

तुषार की बूँद गिरी मेरी पलको पर
हास बनी मेरी जान तेरी कदमों पर
डहराने को आयी मेरी भाग्य मेरे पर
लहर कर गयी मेरी शान तेरे वक्त पर

तेरे ख़्वाब में खुद को खो दूँगा
रश्क में नही,अभीष्ट में आऊँगा
श्रावण की बूँदों मेरी चाह आयेगी
तेरी राहों में मेरी राहत पायेगी

ये बूँदे के सहारे ही तो जीऊँगा
ज़िंदगी के पथ में यूँ ही तो रहूँगा
वक्त के पल से लुप्त हो जाऊँगा
तेरी यादों को कही गुप्त कर जाऊँगा

वक्त के दर्पण में आऊँगा
छिपे चेहरे भी दिखाऊँगा
ज़िंदगी मेरी काफी दूर लिखी है
वक्त के पीछे काफी दूर दिखी है

जीने की राह अभी दिखेगी
जाने कहाँ?ये वक्त टिकेगी
वक्त अब ढल जाने दो
कही तो ठहर जाने दो

रचयिता:रामअवध




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