कही दूर में डूबा हूँ

*कविता*कही दूर में डूबा हूँ

कही दूर की सोच में कही दूर शुबा हूँ
यादों की सोच में वही का नूर में डूबा हूँ
वादे की तस्वीर मेरी चाहत पर रखी है
कभी ना मिटने वाली ये राहत लिखी है

जीने का वक्त भी बदल जायेगा
लोगों का ढंग भी अकड़ जायेगा
सीने में विपत्ति समा कर जायेगा
पीड़ा का रंग बदल कर आयेगा

जीने का बादल कभी ना बरसेगी
कभी ना कभी मेरी यादें तरसेगी
सोच मेरी अब बिखर ही जाती है
चारों दिशाओं में घूम ही आती है

क्यों?शब्दों की लकीर जलाती हो
सीने की साँस को क्यों?डहलाती हो
संसार में हमें ही क्यों?भटकाती हो
हर वक्त शब्दों की माला क्यों?तोड़ती हो

शब्द काट दो,अपनी गलती मानती हो
बोली परख लो,इंसानियत को चाहती हो
बातों से ही तो मानव की सोच दिखती है
कही दूर-तक ये ज्ञान हमें ही लिखती है

रचयिता:रामअवध













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