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देवी अप्सरा

मन में,चाहत थी
कैसी? होती,होगी अप्सरा
केश ऐसे होगेंं?
जो गगन के साथ लहराता हो
लिलार पर बिंदिया ऐसे थे
जिस पर सोलह
शृंगार लहराते हो
नेत्र ऐसे थे,
हिरणी की पलके की तरह
मुखड़ा ऐसे होते,होगे?
कमल की पंखुड़ियों की तरह
आभुषण ऐसे थे,
अलंकारो की सजावट हो
वस्त्र ऐसे थे,
जो चारों ओर लहराते थे
जब चले स्वर्ग की दिशाओं में
धरती लोक पर भी
इसकी सुन्दरता की महक आ जाये
जिसके रुप में,कौन? सा जाल है
सभी को आकर्षित कर लेती है
देवोंं की स्वागत करती है,ये
कला इसका गुण है
नैत्य इसका आधार है
माया का जाल नही है,ये
करुणा का जाल है,ये
इसकी माधुर आव़ाजे
जो चैतन्य को जागा देती है
बेचैन की भावना नही
स्वयं में ही,मनोहारी रहती है
ना जाने,विधाता ने
कैसी? आकृति बनाई
चाँद भी,इसके सामने
फीका पड़ जाता है
तेरी रुप में,ऐसी झलक है
जिसे देखकर,
मैं भी मोहित हो जाता हूँ
इसके मुख में संकट नही
प्रेम का जाल है
प्रेम भी वैसा नही
स्वर्ग ओर धरती को जोड़ दे
नेत्रजल ऐसे थे
करुणा का धार जैसा
इसकी ,मनोभावना को देखकर
देवगण भी विमुख नही होते
वस्त्र वैसा था
मोहिणी का जाल था

रचयिता:रामअवध




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