निसर्ग है हम

*कविता*निसर्ग है हम

माटी की सौंदर्य वक्ष को छू जाती है
जीने की साँसे कक्ष में रुक आती है
समीर में आकर वह खुल जाती है
ज़िंदगी की अक्ष मेरी टूट जाती है

चलते है,ये कदम नीर की बहाव में
आती है,साँसे ज़िंदगी की बहार में
कुदरत की आँगन को भूल मत जाना
ज़िंदगी की आँचल में घुल मत आना

सूरज छिपते ही लालिमा खो जाती
जिंदगी ढलते ही वक्त सो आती है
गगन से गिरी बूँदें कही दिख जाती है
सागर में गिरी बूँदे कही खो आती है

तप-तप कर मुझे रहना पडे़गा
श्रम की तन मुझे खिंचना पड़ेगा
बीहड़ की छाया में मुझे आना पड़ेगा
कुदरत की काया में मुझे जाना पड़ेगा

श्रावन की बूँदों में,मैं सो जाता हूँ
कुसुम की हुस्न में,मैं खो आता हूँ
अम्बर की बहता नीर में घुल जाता हूँ
शिशिर की लहरता ओस में भूल आता हूँ

रचयिता:रामअवध






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