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बेसहारा हो गयी



  

*कविता*

 बेसहारा हो गई है
गौ माता हमारी
ना ही कही,खाने को
सुन्दर सा दुब मिलता है
सच में अनर्थ हो रहा है
गौ माता जी का
शहरों के पथ पर छोड़ देते लोग
अकेला ,ओर बेसहारा रहती है
सभी लोक भुल चुके है
युगो-युगो तक
माँ का दरजा दिया गया है
क्या? भारत था पहले
जहाँ चरवाहों कोई कमी नही थी
उस समय के लोग
सहारा देते थे, गौ माता को
वे भी क्या? दिन थे
जब खेत-खलिहानो में
घुमा करती थी
गौ माता का गोबर
पवित्र माना जाता था
सच में कलयुग आ गया है
कितने बुरे-दिन आ गये
गौ माता जी का
पहले के घरो में
हुआ करता था बसेरा
अब तो बेसहारा रह गयी
गौ माता जी   –

रचयिता:रामअवध



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