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वृक्ष है ,ह्रदय भी विस्तृत है

*कविता*


बदल रहे है,मनुष्य
बदल रहा है, जग
बदल रहे है मनुष्य, मनुष्य का राजमहल
कह़ रहे है, वृक्षों का वन
निश्चल रहता हूँ, परन्तु वेदना सहता हूँ
अपना वेदना किसको? बताये

वृक्षों को काट रहे है,
धरती पर बिछा रहे है,
वृक्षों की शाखा भी सूकुड़ जाते है,
कहाँ? गये वे दिन,
जहाँ पर मनुष्य की चाहत थी

मत काटो मुझे,मेरा भी जीवन है
आंतरिक पहचान है,हमारी
कौन? समझता है, उसका ह्रदय विस्तृत है

अगर मुझे काटते रहोंगे
एक समय ऐसा आयेंगा
नष्ट हो जायेगा,जग

माहुर की हवाओं,तुम बनाते हो
परन्तु स्वच्छ,मैं करता हूँ
कहाँ?गये,ऋतु का बदलना
मत भुलो,हम भी प्राकृतिक एक अंश है

क्यो? आने-वाले भविष्य को,पीड़ित करते हो
क्यो? अलौकिक प्रेम से दुर रहते हो
क्यो? अपनी आस्था को तोड़ रहे हो
क्यो? लौकिक जीवन में घुल रहे हो

कहाँ? गये, वृक्षों की छाया
कहाँ? गये, घनो की छाया
कसाँ? गये, पतझंड़ का मौसम
कहाँ? गये, वह शीतल हवायें
कहाँ? गये, मिट्टी की लहर
कहाँ? गये, वातावरण का संतुलन

रचयिता:रामअवध





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