वृक्ष का कह़रना

*कविता*वृक्ष का कह़रना

बदल रहे है,संसार
बदल रहे है,सकार
बदल रहे है,मानव के महल
कह़र रहे है, वृक्षों का सहल

निश्चल रहता हूँ,परन्तु वेदना सहता हूँ
माटी में रहता हूँ परन्तु नभ में खिलता हूँ
वृक्षों को काट रहे है
धरती पर बिछा रहे है

वृक्षों की शाखा सूख जाती है
काटने पर वह गिर जाती है
नयनों की धारा बहा जाती है
कटने का पीड़ा ले जाती है

जहाँ पर मनुष्य की चाहत थी
वृक्षों की छाया उनकी राहत थी
वनों में उनकी मुलाक़ात थी
गाँव में उनकी ऐसी रात थी

अगर मुझे काटते रहोंगे
संसार भी मिटाटे रहोगें
उम्र भी घटाटे रहोगें
साँस भी मिटाटे रहोगे

माहुर हवाये तुम बनाते हो
नर बनकर तुम दिखाते हो
मैं भी जिंदगी का साँस भरता हूँ
साँसों से पवन लहरता हूँ

क्यो? आने वाले भाग्य को मोड़ रहे हो
क्यो? अलौकिक प्रेम से दूर जा रहे हो
क्यो? अपनी आस्था को तोड़ रहे हो
क्यो? लौकिक जिंदगी में घुल रहे हो

कहाँ? गये,वृक्षों की छाया
कहाँ? गये,वनों की माया
कहाँ छिप गये मौसम की अंग
कहाँ? गये,शीतल हवाओं का रंग
कहाँ? गये,मिट्टी की लहर
कहाँ? गये,सागर की कहर

रचयिता:रामअवध

0 Comments