कृष्ण की जीवन

*कविता*


प्रेम के आधार हो

गोपियों के प्यारे हो
वसुदेव के पुत्र हो 
माँ देवकी की आठवीं संतान हो

कान्हा का स्वर है
बाँसुरी में मोहन है
जाग उठे वृंदावन
यही तो,स्वर्ण है

कौरवो के विनाश हो
पाण्डवों के सहायक हो
अर्जुन के गुरु हो
जनता के विधाता हो

माँ के लला हो

गौऊ के चरवाहा हो
राधा के प्रेम हो
दैत्य के विनाश हो
कंस के काल हो
माँ देवकी की संतान हो

स्वयं विधाता हो
स्वयं विनाश काल हो
स्वयं आधार
स्वयं अंधकार हो
स्वयं ब्रह्मांड हो
स्वयं विधाता हो
तुम में सब है
सब में तुम हो

जब बाँसुरी की धुन हो
मधुबन झुम उठे
गोकुल भी महक उठे
गोपियाँ भी खिल उठे

क्या? जन्म है

क्या? मरण है
सभी के ह्रदय में
आपके गुण है
आसमानों की झलक है
गोकुल के निवासी हो

स्वयं विधाता
स्वयं आधार हो
जो पावन हो जाये
जो आ सके,आपके चरण में
वह खुद में ही पावन हो जाये

सारा नक्षत्र है
आपके चरण में
सारा स्वर्ण है
सारा ब्रह्मांड है
आपके चरणों में
फण शेषनाग का है

बाँसुरी की लहर हो
चरण पड़े जिस धरती पर
आपके मुख में
आपके चारो ओर

रचयिता:रामअवध



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