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धरती की ओर एक झलक

*कविता*

मनुष्य भुल चूके हैं,
हम सब धरती पर ही रहते है,
एक ऐसी धरती
जिस पर गुलश़न का वसेरा हो,
यदि कोई एक झलक, देख ले
इस धरती को ,
वह इहलोक भुल जायेगा,
समग्र-वैभव ,इसके-सामने फीका पड़ जायेगा
मनुष्य की अभिलाषा पुरा करती है
धरती की उर्वरता,फिर भी कष्ट देते है,
हम मनुष्य ,किसी असुर से कम नही है
धरती की सुन्दरता को,
नष्ट करने में लगे है
पेड़-पौधों तूफ़ानों की तरह
काटते- जा रहें है,
पर्वतों को सूना कर रहे हो
नदियों को, नालों बदल दियें
मनुष्य धरती को कष्ट दे रहे है,
धरती के कण-कण में गुण है
इसी गुण से
प्राकृतिक सौंदर्य नजर आता है,
मनुष्य तकनीक में
आगे बाढ गये है,
प्राकृतिक से नाता तोड़ दिये
धरती को अपवित्र कर-रहे है

रचयिता:रामअवध


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