सृष्टि की देन

*कविता*सृष्टि की देन

श्रावण के दिनों में
कुदरत के सीनों में

बहाव के साथ ये नीर चलती है
लगाव के साथ ये वीर लड़ती है
उड़ते परिंदों की उड़ान देखता हूँ
ठहरते ज़िंदगी का वक्त लिखता हूँ

दुर्भिक्ष की छाया,सौम्य में उतर आयी है
ज़िंदगी की माया,मनुज में उभर आयी है
व्योम की काया ही कुदरत को बनाती है
मेघों की धारा ही भूमंडल को महकाती है

निसर्ग की बनावटी तो है
ज़िंदगी को सजाती तो है
विधाता को बुलाती तो है
जीने की साँसे देती तो है

सृष्टि की यादें हमें दिखाती है
दृष्टि की वादें हमें छिपाती है
वक्त मेरी ही मुझे उठाती है
यादों की जग मुझे सुलाती है

समीर ही तो है,जो मुझे राहत देती है
गगन ही तो है,जो मुझे चाहत देती है
हेमंत की ओस ही जो मुझे खो देती है
ख्वाबों का राज़ है जो मुझे रोक लेती है

रचयिता:रामअवध





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