future

श्रावण को लाओ




*कविता*

श्रावण के दिनों में
देखा मैंने,अम्बुज को
धरती पर उतरते हुए

नदियों को लहरते हुए देखा
मंजरी को उत्फुल्ल हुए देखा
मानव को,नाचते हुए देखा
श्रावण के दिनों मे,देखा मैंंने
खेतो में,नीर को भरते हुए देखा
तितलियों को,मँडराते हुए देखा
बादल को घेरते हुए देखा
दिन में रात देखा
श्रावण के दिनों, में देखा मैंंने
मेंढक को पोखर में जाते देखा
लोगो को भागते हुए देखा
दुर्भिक्ष को,सागर मे बदलते हुए देखा
मानसुन को उतरते हुए देखा
श्रावण के दिनों में, देखा मैंंने
लोगों को , खुले गगन में आते देखा
अम्बर में, सागर देखा
धरती को,उर्वरता हुआ देखा
धान को रोपते हुए देखा
श्रावण के दिनो में,देखा मैंंने
शीतल हवाओं को आते देखा
पेड़ो की पत्तियोंं से, देखा मैने
बूँदो को टपकते हुए देखा
बादल को गरजते हुए देखा
श्रावण के दिनो में ,देखा मैंंने
अम्बर को चलते हुए देखा
मैंने देखा, अनंत बूँदो का सागर
श्रावण में,झूलो को लहरते हुए देखा
श्रावण के दिनोंं में,देखा मैंने
कोयल को कुछ कहते हुए सुना
देखा मैंने,सुन्दर वन
खिल उठे गुलशन का वन
रातो को,भीगते हुए देखा
देखा मैंने, श्रावण को
मोर को नाचते हुए देखा
देखा मैंने,पंक्षियों को
घौसले में जाते देखा
क्षितिज को मिलते हुए देखा

रचयिता:रामअवध





Post a Comment

0 Comments