गौरैया

*कविता*गौरैया

वृंद में तुम उड़ती थी
घर में तुम बसती थी
अँगना में लहराती थी
मेघों को सहलाती थी

गौरैया तुम ही घर की ताज थी
ना दिखने पर धर की राज़ थी
ईंटों से जुड़ी ज़िंदगी आयी थी
गौरैया से हटी ज़िंदगी छायी हथी

धीरे-धीरे गौरैया हटने लगी
ईंटों का ज़माना पड़ने लगी
साँस उसका अब घुटने लगी
गौरैया की ताज अब मिटने लगी

बचपन की दौर में तुम्हें देखा हूँ
यादों की जौर में तुम्हें लिखा हूँ
विलुप्त की दौर में तुम नज़र आती हो
मनुज की तौर में तुम शजर बनाती हो

ढूँढता हूँ,तुम्हें बीहड़ की छाया में
आ जाता हूँ,गौरैया तेरी माया में
हक़ीकत की गौरैया कही दिखती नही
गौरैया की ताज कही बिकती नही

रचयिता:रामअवध

























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