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कह रहा है खेतिहर

*कविता*कह रहा है खेतिहर

कह रहा है खेतिहर
सुन लो मेरी एक पुकार
देख लो मेरी एक दीदार
समझ लो मेरी एक हार
देख लो मुझे एक बार

करुणा का जाल बिछा दो
जिंदगी में मेरी लाश बूझा दो
मुझ पर भी ध्यान बरसा दो
किसानों पर भी इतिहास बना दो
जिंदगी में मेरी प्यास बूझा दो

नभ में भी विकट मँडराते है
लूटने पर नेता डगमगाते है
न्यान नही,अन्याय हो रहा है
प्रगति नही,दुर्गति हो रहा है
सुन लो,मेरी एक पुकार
देख लो मुझे एक बार

कुछ जनों को सत्ता का अभिलाषा
मुझे आता है माटी की परिभाषा
माटी को हम निखारते है
भूमिपुत्र हम कहलाते है

अश्रु नही,प्रतिशोध है ये
सत्ता नही,षड्यंत्र है ये
जो सुन सके मेरी कथा
जो ले सके मेरी पथा

संकट का जब बादल छाया है
व्योम में भी विकट मँडराया है
जिंदगी भी अब अटल रहा
संसार भी अब निकट रहा

विपदा में स्वयं ग्रस्त हो जाते है
जीने के पल में यूँ ही बस जाते है
मानव भी दुर्भाग्य को दोषी देते है
कर्मों की पहचान नही देखते है

रचयिता:रामअवध






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