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ख़्वाब की रात

*कविता*


ख़्वाबों मेंं रहता हूँ
ना जाने क्यो?
खोया-खोया सा रहता हूँ
दिल तो करता है,
नाता तोड़ दूँ, इस दुनिया से
ना जाने क्यों?
दिलों में अरमान सा रह जाता है
ख़्वाब नही है,ये
जीवन का संकेत है,ये
ना जाने क्यो?
ख़्वाबों में चाहत सी होने लगी है,
अधुरापन जुड़ सा जाता है,
सोचता हूँ,कही ये
माया का जाल तो नही,
पर एक बंधन सा लगता है
जब आधी रात को, चाँद देखता हूँ
ना जाने क्यो?
सर्वप्रिय सा लगता है
ख़्वाबों में वास्तविक नजर आता है,
ना जाने क्यो?
जीवन का ,क्या? मनोरथ है
मुझे दुनिया अज़ीब सी लगती है,
ना जाने क्यो?
ख़्वाबों में खोया-खोया सा रहता हूँ
ना जाने क्यो?
बेचैन सा रहता हूँ
ख़्वाबों में आते ही,
चैन से रहता हूँ
ख़्वाबों में बनाया एक कुटिया
ना जाने क्यो?
खोया-खोया सा रहता हूँ
कभी सोचता हूँ,वापिस ना लोटी
फिर एक ख्याल ,आ जाता है
कही माँ का आँचल ,
अधुरा सा ना रह जाये
ख़्वाबों की तलाश में ,
खोया एक पथ
भटक चुके थे,हम उस पथ पर
ना जाने क्यो?
उस पथ का अंत कहाँ-तक था
चलते-चलते अटूट गये अंग
पर हौसला बुलंद था
देखा एक दृश्य
मंजिल स्वर्ग से भी ,अधिक सुन्दर था
निकल पड़े अकेले,
संघर्ष की ओर
ना जाने क्यो?
खोया-खोया सा रहता हूँ

रचयिता:रामअवध

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