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बचपन की यादे,वही ठहराने

*कविता*


जहाँ-जहाँ बचपन गुज़रा
वहाँ-वहाँ क्या? दिन थे,
वहाँ- वहाँ खुशियों के पल थे,
वह जीवन भी, क्या? जीवन था
था,वहाँ खुशियों का स्वर्ण
जहाँ तृष्णा की कोई तुलना नही,
जहाँ मित्रों के साथ विलिन रहते थे,
वह भी क्या? दिन थे,
जहाँ बचपन गुज़रे थे,
जब सवेरा होता,
पंक्षियों की चहल-पहल होते ही,
वह माधुर आहट,
कर्ण को छुकर निकल जाती थी
जब मेरी नींद खुलती थी
तब निकल पड़ते थे,
खेतों-खलिहानों मे,
था सवेरा का अद्भुत दृश्य
वह भी क्या? दिन थे
जहाँ बचपन गुज़रे थे,
मित्रों के साथ चल पड़ते थे
उद्यानों में ऊचल-पुचल मचाने,
वह भी दुष्टता वाले दिन थे
वह खेतों से,ईख चुराना
वृक्षों से फल चुराना ,
वह भी क्या? दिन थे
ना-नही,किसी के प्रतीक घृणा थी
वह भी क्या? दिन थे
जहाँ बचपन गुज़रे थे,
ननिहाल में जाकर,
फसलों की रखवाली करना
मक्का के खेतों से,
पंक्षियों को उड़ना
वह भी क्या? दिन थे
राजगीर का पहाड़ देखकर,
ऐसा लगता था
संपुर्ण जग यही तक थे
वह भी क्या? दिन थे
जहाँ बचपन गुज़ारे,
अचानक एक झोंका, सा लगा
जो सीधा ह्रदय मे,प्रवेश हुआ
पता चला की, अब चलेंगे दिल्ली
फिर हुआ, मन व्याकुल
निकल पड़े, दिल्ली के लिए
प्रेम का अनुभव हुआ,दिल्ली में
फिर शिक्षा ग्रहण किया?,दिल्ली में
जब बड़ा हुआ,तो याद आ गयी बचपन की
जहाँ-जहाँ बचपन गुज़ारा
वहाँ-वहाँ क्या? दिन थे

रचयिता:रामअवध


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