बचपन की ठहराव

*कविता*बचपन की ठहराव

जहाँ-जहाँ बचपन गुज़रे थे
वहाँ-वहाँ क्या?दिन आये थे
वहाँ- वहाँ खुशियों के पल थे
ज़िंदगी के अपने अंदाज थे
लड़प्पन के अपने पैग़ाम थे

जहाँ बातों की कोई तुलना नही था
वहाँ यादों की कोई भूलना नही था
ज़िंदगी के हर पल में मौज होती थी
बचपन के खेल में मेरी फ़ौज होती थी

वह भी क्या? दिन थे
जहाँ बचपन गुज़रे थे
खुशियों का डगेरा था
अरमानों का नगैरा था

पंक्षियों की चहल-पहल होते ही
मेघ की माधुर आवाजें आते ही
कर्ण को छूकर निकल जाती थी
ज़िंदगी जीने की डगर बता जाती थी

दोस्तों के साथ चल पड़ते थे
यादों के सवेरा में रह जाते थे
जिन्दगी के पल में ठहर जाते थे
पल की यादों में पहर जाते थे

वहाँ भी दुष्टता वाले दिन थे
वहाँ भी ज़िंदगी वाले रंग थे
मुलाक़ात की अपनी ढंग थी
लड़प्पन की अपनी यंग थी

ना नही किसी के प्रतीक घृणा थी
ना नही किसी के प्रतीक तृष्णा थी

पंक्षियों के साथ घूमना
सूरज के साथ ढलना
अतीत के साथ बसना
ज़िंदगी के साथ रहना
यादों के साथ ठहरना

रचयिता:रामअवध









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