कुदरत की बूँद

*कविता*कुदरत की बूँद

 मेघों की सागर गुनगुनाती है
बूँद बनकर हमें सहलाती है
वनों की रस से हमें महकाती है
जीने की इच्छा हमें जागती है

शिखर पर धराधर का आना
पक्षियों का लहर कर जाना
सरोवर में कुसुम कोई शारदा नही
जिंदगी में कुटुम्ब कोई नारदा नही

यही तो है,रौण्य की लहिमा
यही तो है,उपवनों की महिमा
कुदरत की साँसे अब मिटने लगी
ज़िंदगी की छाया अब हटने लगी

वहाँ है,मनुष्य की चाहत
वही तो है,वक्त की राहत
यही तो है, वनों का बसेरा
यही तो है,स्वर्ग का सवेरा

यही तो है,अरण्य का गहना
यही तो है,ज़िंदगी का सहना
वक्त है,जो अतीत को बुलाती है
अतीत है जो वक्त को ठहराती है

वही तो है,पृथ्वी का शृंगार है
ढल जाने पर वही तो अंगार है
धैर्य की चमक से ये रस भरता है
कुदरत की हवा से ये क्षम ढलता है

हम तो चल पड़े,डगर की ओर
ज़िंदगी बस गये,नगर की ओर
हम निखर गये,शहर की ओर
ज़िंदगी कट गयी,कह़र की ओर
जीने लगे हम,ज़हर की ओर

रचयिता:रामअवध

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