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रौण्य की लहिमा,अरण्य का गहना


*कविता*

वह शिखर पर धराधर का आना
वह पक्षियों का आगमन
वह सरोवर में कुसुम का वृन्द
वह रौण्य की लहिमा

वह उपवनों का सुगंध
वह हँसो का जोड़ा
वह नीले -नदियों की लहर
वह जीव-जन्तुओ का सवेरा

वहाँ है,मनुष्य की चाहत
वही तो है,जनों की श्रध्दा
यही तो है, वनवास काटने का बसेरा
यही तो है,स्वर्ग का बसेरा

यही तो है,अरण्य का गहना
यहाँ भेदो की कोई अध्दा नही
यहाँ लोगो की शारदा है
यहाँ इन्द्रधनुष की जगमगाहट

यहाँ मेघों का सागर
यहाँ ह्रदय का मनोहारी
वही तो है,पृथ्वी का शृंगार
वह विधाता का वरदान
यही तो है, इतिहासों का शिला-लेख

वह वनप्रिय की मधुर आवाजें
वह क्षण्दा में जुगनूँ का जगमगाहट
वह जनजातियों का बसेरा
यही तो है, हिमगिरी का विशाल रूप
हम तो चल पड़े,डगर की ओर

रचयिता:रामअवध

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