कहाँ जीऊ,जिंदगी के पल

*कविता*

मैं खड़ा था
उस दुनिया में
जहाँ भाग-दौड़ की राह थी
वहाँ मन भी ,वीराना सा लगता है
कहाँ जीऊ, शांति के पल
भाग-दौड़ की दुनिया में
थक चुके है,हम
कहाँ जीऊ,किसी के दो पल
वह पल भी ,वीराना सा लगता है
मन भी भटक चुका है
किसी के सुहाने पल के लिए
वह पल भी कही
नजर नही आ रहा था
कहाँ जीऊ,शांति के पल
देखा है,मैंने
लोगों के आँसू में
अभिलाषा की झलक देखा
नेत्रजल में बहाव का, धारा देखा
चेहरे पर संकट देखा
कहाँ जीऊ,शांति के पल


रचयिता:रामअवध

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