बीहड़ कहर चुकी है

*कविता*बीहड़ कहर चुकी है

मानव की धारा बहक चुकी है
भूमंडल पर वह कहर चुकी है
दानव की दौड़ में मानव भाग चुकी है
बीहड़ की काया हटाने निकल चुकी है

कह़र कर ये धरती अब बोल चुकी
सुन कर ये मानव अब ढोल चुकी
विपत्ति सहती है नर को बता चुकी
नयनों की धारा अपनी बहा चुकी

ये बवंडर की रेखा,ये राख उड़ती है
ज़माने के पीछे मेरी बात लिखती है
शृंगार की मुलाक़ात अब जाग चुकी है
भूमंडल की पोखर अब भाग चुकी है

ये तिमिर की छाया ही तो है
जो ख़ौफ़ को जकड़ कर रखती है
ये अरण्य की माया ही तो है
जो पंरिदों को पकड़ कर रखती है

 ज़िंदगी की साँसे को तलाशता हूँ
वनों की बहार ही तो कहलाता हूँ
जीने की साँस पकड़ कर रखता हूँ
अरण्य का गहना जकड़ कर रखता हूँ

रचयिता:रामअवध




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