माटी का चरण

*कविता*माटी का चरण

बैठ जाता हूँ,माटी के चरणों में
पल भर का सुकून मिल जाता है
रह जाता हूँ,माँ के आँचल में
ज़िंदगी का अहसास मिल जाता है

माटी नही है,ज़िंदगी पुकार है ये
साँस नही है,ज़िंदगी उभार है ये
माटी की बातें कुछ कह जाती है
मानव की रातें कुछ रख जाती है

मैं ही तो
अम्बर का बरसता बादल का ठहराव हूँ
मैँ ही तो
गुलशन का खिलते फूले का महकता बादल हूँ
माटी आँचल में,खिल जाते है
फसलों का लहर-लहराते है

गहरा नाता है,अन्नदाता का
ठहरा वादा है,ये विधाता का
माटी भी हमें कुछ सीखाती है
ज़िंदगी जीने का साँस दिखाती है

मैं बैठ जाता हूँ
माटी के आँगन में
मैं बैठ जाता हूँ
माँ के आँचल मेँ

सहकर कष्ट सहती है
रहकर नष्ट भरती है

मैं बैठ जाता हूँ
खुले नभ में
मैं रह जाता हूँ
खुले पल में

मैं बह जाता हूँ
माटी की करुणा में
मैं रह जाता हूँ
ज़िंदगी की यादों में

ओझल सा,हो जाते है
उजल कर बस जाते है
मैं बैठ जाता हूँ
मैं बस जाता हूँ

समझ लो,माँ की अभिलाषा
समझ लो,माटी की परिभाषा
जहाँ चरण पड़े,इस माटी की
वहाँ सीस झुकाउँगा माफी की

रचयिता:रामअवध






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