future

लोग बदल रहे है

*कविता*

लोग बदल रहे है
आसमान दमक रहा है
धरती गरज रहा है
पवन बोल रहा है

भूलते जा रहे है
अपने करुणा को
गहते जा रहे है
अपने जीवन को

भूल गये, हम अपने जीवन को
जहाँ अपने भी पराये हो जाते है
ह्रदय में प्रहार हुआ
जीवन में निराशा छाया

बदल रहे है,लोगों के संस्कार
बदल रहा है, भारत की संस्कृति
बदल रहे है,आसमानों के रंग
बदल रहा है,मौसम का गुण

कही चैन है
कही बेचैन है
कही दुख है
कही आनंद है

बुराई में घुल रहे है,लोग
अच्छाई को छोड़ रहे है,लोग
देखते है,आँखों से भ्रष्टाचार
आँखों में ही छूपा लेते है

इस पावन धरती को
धावन बना रहे है
समय चल रहा है
लोग बदल रहे है

अपने में ही बना लेते है
महाभारत का रण
सब छोड़ देते है
यही संसार को
जीना भी यही है
मरणा भी यही
दमकते है,लोग
हँसते है,लोग

रचयिता:रामअवध


Post a Comment

0 Comments