हालत का चक्र

*कविता*हालत का चक्र

जिंदगी भी कुछ सिखाती है
लोगों का दर्पण भी दिखाती है
कौन-कैसा?है,इसका अर्पण भी सिखाती है
गिरगिट की तरह बदलते हुऐ भी दिखाती है
मिट्टी पर ही चलना है
मिट्टी पर ही रह जाना है
यही जहान पर देखा है
आँचल में,माँ का रूप देखा है
बूढ़े लोग भी कुछ सीखाते है
जीवन का सही राह बताते है
माँ सच कहा करती थी
जीवन की राह सुनाती थी
समझ ना पाया बातों को
चुकना है जीवन की हालतों को
लोगों की हालत ऐसी है
ना खुश रहने जैसी है

जिंदगी जिओ,खुले गगन की तरह
राहों में जाओ,खुले पवन की तरह
कब?चलना है,कब? संभलना है
चलते-चलते चलना सीख लो
संभलते-संभलते संभलना सीख लो
लोगों से सीखा,जीवन बीताने का तरीका
अपने-आप से सीखा,जीवन जीने का तरीका
कहाँ दौलत से खुशियाँ मिलती है?
हमें तो शोहरत ही दिखती है
ना ही कुछ ले जा पाओगें
ना ही कुछ ला सकोगें
दुनिया हर चीज़ नही सिखाती
कुछ हालत भी सीखा देती है
लोग क्या? समझते है,समझने दो
कौन-क्या? कहता है, कहने दो
अपने भी पराये हो जाते है
गैर भी अपने बन जाते है
वक्त का बदलना भी ठीक है
लोगों का सर्जना भी ठीक है
जिंदगी हुई नही कट जाती
समय हुई नही ढल जाती

लोगों की दशा भी देखो
अपनी आशा भी देखो

रचयिता:रामअवध



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