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सपना

*कविता*सपना

कुछ सपना है,जो आँखो पर सजाया हूँ
कुछ पाना है, जो दिलों पर बसाया हूँ
कुछ विपत्तियाँ है,जो जीवन में सताया है
कुछ अपने है,जो जीवन में चलना सीखाया है

दिन विराना लगता है
रात सौहाना लगता है
चाँद देखता हूँ सपनों में
दिन होता है अपनों में

कुछ सपने है,जो अपने है
कुछ अपने है,जो सपने है
टूटकर रह जाते है ये सपने
बिखरकर बस जाते ये अपने

सपनों में भी जान होती है
उनमें भी पहचान होती है
ज़िंदगी की शान होती है
ज़िंदगी के नाम होती है

सपनों का प्यासा हूँ
जिंदगी का उल्लासा हूँ
रात कहाँ? कटता है
दिन कहाँ? ढलता है

सज गया है,सपनों का गुलशन
रह गया है,अपनों का गुलशन
कुछ आदतें है,जो छिपा नही पाया
कुछ हौसले है,जो दिखा नही पाया

रचयिता:रामअवध


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