चाँद रुठ गया

*कविता*

चाँद पर उतरना चाहते थे
लम्बा इतिहास बनाना चाहते थे

लम्बा सफ़र बनकर आये थे
वर्षों का सपना साथ लाये थे
करोड़ो की आशा साथ लाये थे
मेहनत की लकीरे भी साथ लाये थे

रूठ गया ,चाँद का मुखड़ा
टूट गया ,दिल का टुकड़ा
दौराऊंगा इतिहास को,फिर लौटूँगा चाँद पर
फिर टूटेंगे नही,फिर जुड़ जायेंगे चाँद पर

कुछ पाने की इच्छा थी
कुछ लाने की इच्छा थी
चांद के टुकड़े रूठ गये
फिर हम भी टुट गये

जब टूट गया,चाँद से नाता
आसमान में देखता हूं,अपना नाता
धरती से देखा,चांद की खुबसूरती
चांद से देखा,धरती की खुबसूरती

हम चांद के दिवाने थे
लोगों के हवाले थे
आँख से आँसू जम कर रह गया
चांद भी टूट कर रह गया

रचयिता:रामअवध


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