निकल पड़े

*कविता*निकल पड़े

निकल पड़े, किसी के पैगामें  में
बिखर गये,किसी के जमानें में
छोड़ चले ,अतीत को
मोड़ चले, व्यतीत को

अंधेरियाँ रात है, रास्ते ं में विराट है
सवेरा है, पर एक पथ पर निकट है
समुंद्र सी लहर है ,मुझमें
किनारा सा ठहर है,मुझमें

जमा़ना भी क्या? तकदीर लायी है
किस्मत भी क्या? लकीर लायी है
मौसम का बदलना लगा रहता है
लोगो ं का चलना भी लगा रहता है

पथ पर दुनिया की कतार देख रहा था
वक्त कैसा है?,इसका अनुमान लगा रहा था
अकेले ज़िंदगी में निकल पड़े
जहाँ जी सके,वहाँ चल पड़े

वक्त मुझे खिंच रहा है
अतीत मुझे लिख रहा है
उस जमा़ने में ढल रहा हूँ
बस में निकल रहा हूँ

जमा़ने में वक्त सताते है
बीते हुए कल बताते है

पेट में कोई अन नही
जेब में कोई धन नही
रुप में कोई स्वरूप नही
धूप में कोई रूप नही

कुछ हवाओं का सनसनाहट चलती रहती है
कुछ जमा़ने की तकदीर भी जलती रहती है
कोई रोकने वाला नही है
कोई छोड़ने वाला नही है

सुना हूँ कुछ, समझा हूँ कुछ
घबराया नही हूँ, बताया भी नही हूँ
अब जिंदगी समझ में आती है
लोगो की बीते पल याद आती है

रचयिता:रामअवध



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