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मजदुर

*कविता*

पल-भर में पसीने का गिरना
क्षण-भर में अगों का टूटना
सुरज के साथ तापते है
गुज़र-बस़र के साथ रहते है

मजबूरियाँ साथ लेकर चलते है
तजुर्बा साथ लेकर बसते है

घर की डोर से बंध जाते है
कम ही डोर उलझ जाते है
अपनी चाहत को मार देता हूँ
खुद को बदल लेता हूँ

सेठ की चापलसी देखो
पेट में भुखमरी देखो
सुनाता हूँ किसी की परिभाषा
गुणवत्ता है किसी की अभिलाषा

लम्बा साँस बरता  हूँ
मन में एक अहसास डालता हूँ
मेहनत को चुकाना है
स्नेह बनकर चमकाना है

मजदुरियां मजबुर बन जाती है
दुरियाँ तकदीर बन जाती है
धूप में तापते है
धूल में लागते है


रचयिता:रामअवध


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