मजदूर

*कविता*मजदूर

पल-भर में पसीने का गिरना
क्षण-भर में अंगों का टूटना
सूरज के साथ तापते है
गुज़र-बस़र के साथ रहते है

मजबूरियाँ साथ लेकर चलते है
तजुर्बा साथ लेकर बसते है
यादों को बाँध कर हम रखते है
उन्हीं यादों के सहारे हम जीते है

घर की डोर से बंध जाते है
कम ही डोर में उलझ जाते है
चाहत को मार देता हूँ
खुद को बदल लेता हूँ

भाग्य के आगे झुकता नही हूँ
वक्त के पीछे रुकता नही हूँ
सुनाता हूँ,अपनी परिभाषा
दिखाता हूँ,अपनी अभिलाषा

मेहनत के कदम कभी रुकता नही
ज़माने के पीछे कभी झुकता नही
पसीनों से गिरने वाला कभी चुकता नही
मेहनत की ज़िंदगी में कभी छिपता नही

मजदुरियां मजबूर बन जाती है
दूरियाँ तकदीर बन रह जाती है
कम वक्त में गिर जाते है
थम कर हम बस जाते है

धूप में तापते है
धूल में लागते है


रचयिता:रामअवध


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