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जल

    

*कविता*

दिन पर दिन घट रहा हूँ
जल चक्र में फँस रहा हूँ
मनुज की सोच देखो
जल की कीमत की रेख देखो

लोग समझते नही ,जल की कीमत को
सब समझते है,बिजली की कीमत को

मानव जीवन को समझों
जल का अहसास ना होने पर समझों
यूँ ही नही बहा दो जल को
जल का महत्व को समझों

जल को बहाते हो
संकट को ललकारते हो
मैं वे नही,जो सागर में रहता हूँ
मैं वह हूँ, जो धरती को समझता हूँ

हमारी कहर तो मानों
जल संग्रह को बनाओ
धरती की उर्वरता को बचाओ
जीवन को संक्रलण में लाओ

संकट का दिन आयेगा
बूँद-बूँद के लिए तरसोगें
आसमानों में देख ना पाओगें
नीर की परख़ ना  देख सकोगें

धरती की आकृति बदल गयी
मानसून ने मुँह फेर लिया
मेघ का रूप ना देख पाओगें
भू पर ,मानव प्यास ना बुझा पाओगेें

रचयिता:रामअवध

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