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लोगों का दर्पण

*कविता*

आओ मिलकर,सुन्दर इतिहास बनाओ
जाओ जुड़कर,सुन्दर समाज बनाओ
भारत में रहकर कुछ करके दिखाओ
माँ-बाप की आशा है,कुछ बनकर दिखाओ

समय की गहराई में मत जाओ,कुछ पा ना सकोगें
अपनी ही गहराई में जाओ,कुछ ला सकोगे
हम अपना दर्पण खुद ही बन जायेगें
समाज बदल जाये,ऐसा अर्पण नही दिखायेगें

कहाँ ?जाओगें,धरती को छोड़कर
कहाँ ?जाओगें,माँ को छोड़कर
खिल जाओ समाज के गुणों में
मिलकर रहो ,अपने दर्पण  में

आओ मिलकर एक लफ़्ज सुनाता हूँ
आओ मिल-जुलकर एक गीत सुनाता हूँ
आओ मिल जाये ,ऐसा जुड़कर दिखातें है
प्यार मिल जाये ,ऐसा कुछ करके सुनाते है

बुलाओ मत ,मुलाकात जरूरी नही है
सुनाओ मत ,हालत कुछ ऐसी  है
किसी के साथ हँस-हँस कर बोला हूँ
किसी के साथ रह-रह कर डोला हूँ

रचयिता:रामअवध



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