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विधाता

*कविता*

देख ना पाया  विधाता को
ज़िक्र करता हूँ उल्लासा को
भूमंडल भी प्यारा लगता है
ईश्वर भी न्यारा लगता है

ना ही हिंसा में हूँ,ना ही संहिता में हूँ
ना ही मैं रक्त के अंगो में हूँ
बस आत्मा के वक्त में हूँ
ना मै ं मंत्रों में हूँ,ना मैं द्वार में हूँ
मैं बसा हूँ आप-लोगों के प्यार में हूँ
एकांत हूँ मै,सबका ध्यान में हूँ

अनुभूतियाँ है,जो कुछ कहती है
प्रेम है,जो कुछ सुनाती है
भविष्य को देख ना पाओगें
ईश्वर को क्या? पहचान पाओगें

दिल का दरवाजा है ये
प्रहार की कोई भाषा नही है ये

प्रेम हो या सागर हो
काल हो या विनाश हो
दुख हो या सुख हो
जीवन हो या मरण हो
आत्मा हो या परमात्मा हो
भविष्य हो या वर्तमान हो
स्वर्ग हो या नरक हो
मंत्र में हो या श्रध्दा में हो
सभी में आपका ही वास हो

नक्षत्र पर उनकी माया देखो
चमकती हुई ताया पर आया देखो
विधाता का स्वरूप ना देख पाओगें
विनाश का काल ही स्वरूप देख पाओगें

जीवन में जीवन नही पाया
विश्वास पर विश्वास नही आया
कहाँ खोजोगें मुझे
कहाँ ढुढोगों मुझे

सुन्दर दुनिया किसने बनाया
पर कोई शक्ति है जिसने सजाया
दुँओ में मुझे याद किया जाता है
घरों में मुझे पुकार लिया जाता है

खुशियों का अनंत लहर हूँ मैं
आत्मा का भी पुकार  हूँ मैं
संकट का स्वयं प्रहार हूँ मैं
सबको अन्दर में वास हूँ मैं


रचयिता:रामअवध

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