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मत बाँधों मुझे

*कविता*

मत बाँधो मुझे ,मैं बिगड़ जाऊँगा
मत छोड़ो मुझे,मैं बिखर जाऊँगा
दानव की बुराईयों से मत बाँधो  मुझे
जीवन में किसी के सहारे भी मत बाँधो मुझे

उन्हे भी जीने दो,खुले बन्धन में
मुझे भी जीने दो,उसके मंथन में
नजरों में ही उसने बाँध दिया मुझे
नजरों में ही उसने गिरा भी दिया,मुझे

इन परिंदो को मत बाँधों,इन्हें भी पंख फैलाने दो
इन वनों को मत काटों ,इन्हें भी तन फैलाने दो
बचपन की यादे,कभी मत छोड़ो
माँ-बाप की आशा ,कभी मत तोड़ो
किसी के वादे भी ना तोड़ो
अपना लक्ष्य को भी ना मोड़ो

एक दस्तावेज पर उसका नाम लिख दो
पुरे कलम से उसका इम्तिहान लिख दो

बहुत दुखी हो गया हूँ माँ,वेदना को गिन-गिकर
ये सिर भी झुक गया है माँ,तेरी आशा चुन-चुनकर

संघर्ष की बाते किया करो
कौन? किसके सहारे आ जाये ,ये बात किया करो
किसी ओर के सहारे भी लिया करो
किसी ओर के हवाले हुआ करो

किसी ओर के पास नही जा सकता
तुम्हारे सिवा किसी ओर के हवाले नही जा सकता
बाँध दो मुझे, किसी के बन्धन से
याद रखूँगा, उसके दिल के बन्धन से


रचयिता:रामअवध




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