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कोई नही हैं

*कविता*

अकेला चल पड़ा हूँ
यादों को छोड़ चला हूँ
खुद में ही खो गया हूँ
खुद को मोड़ चला हूँ

पढ़ना- लिखना भुल गया हूँ
बातें करना भी भुल गया हूँ
कुछ यादों को भी भुल गया हूँ
कुछ सपनों में  टूट गया हूँ
किसी वादें पर बिखर गया हूँ
माँ-बाप की चरणों में झुक गया हूँ

किसी के ख्यालों में डुबना छोड़ दिया हूँ
किसी के हवाले को भी मोड़ दिया हूँ
वही सवेरा ,वही शाम
वही काम,वही धाम

रूचि रही ना इन बातों में
दिल रहा ना इन कामों में
इन लोगों को परख  गया हूँ
किसी के सहारे नरक गया हूँ
कविता की आँखों में सज गया हूँ

कुछ बातें बताई जाती है
कुछ यादे ं सताई जाती है
कुछ यादें छोड़ चले हम
कुछ बातों को समझ गये हम

उसी हालत से हम भी गुज़र चुके है
किसी के लफ़्ज़ों में हम भी रह चुके है
उसी के पास से गुज़र कर निकल गया हूँ
उसी की शहनाई में तनाई बन निकल गया हूँ


रचयिता:रामअवध

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