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हिमगिरी से निकलती हूँ,सागर में गिरती हूँ


हिमगिरी से निकलती हूँ
बादलों के साथ चलती हूँ
हवाओं के साथ मुड़ती हूँ
लम्बा सफ़र करती हूँ

दिशा का मुझे ज्ञान नही
रास्ता का मुझे पहचान नही
मुझे पहचान सके,किसी में परख नही
ठहर जाऊं,ऐसी मेरी माया नही

सुख ना सके मेरी धार
रूक ना सके मेरी लहर
अम्बर से नीर का गिरना
भुमंडल में धारा का बहना

लम्बा सफ़र बन कर गुजर जाती हूँ
श्रावन के दिनों में चढ़कर आती हूँ
मैं रुक जाऊँ ऐसी चाहत नही
मैं टूट जाऊँ ऐसी अमानत नही

खुद लहर कर ठम जाऊँगी
खुद जम कर ठंड जाऊँगी
सागर में जाकर विलिन हो जाऊँगी
नई धारा बनकर निकल आऊँगी
खुद का रास्ता बनाकर चलूँगी
फिर  जलचक्र आकर बँध जाऊँगी
फिर मैदानों में सन्न-सन्नाहट करती आऊँगी
रंग-बिरंगे धारा बनकर आऊँगी



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