शायरी

*शायरी*

अकेला रहकर भी अजनबी हूँ
साथ रह जाऊं,तो सुनामी हूँ
चलता हूँ किसी यादों में
ठहरता हूँ, किसी वादों मे

लम्बे समय तक ,किसी का इन्तजार किया?
उसी की उम्मीद पर, मुझे जीने का इन्तजार आया
किसी ने हाथ छोड़ा
किसी ने साथ भी छोड़ा

समुंद्र से मैंने कहा ,मुझे  किनारा दिखा दो
समुंद्र ने कहा ,बहो में आकर समा जाओ
प्रेमिका से कहा ,मुझे प्रेम का सागर में लेकर जाओ
किनारा में जाकर छोड़ दिया

किसी के सहारे मत जिओ
किसी के करीब मत जाओ
कौन? किसके  साथ जीना चाहता है
वह साथ निभा ही लेता है

प्रेम भी इम्तिहान लेता है
खुद को खुद से जोड़ता है
कायर के साथ रहकर वीर बन जाओ
खुद के साथ रहकर पीर बन जाओ

रचयिता:रामअवध





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