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करवा चौथ

*कविता*

सोलह शृंगार की कठपुतली बनी हूँ ,मैं आज
किसी के इंतजार में बेचैनी बनी हूँ मैं आज
किसी प्रेमी का प्रेमिका बनी हूँ मैं आज
किसी मुखड़े के लिए चाँदनी बनी हूँ मैं आज
किसी के सजावट का रूप बनी हूँ मैं आज

जब-तक मेरी साँसों में तेरी महक हो
तब-तक तेरी आँखों में तेरी झलक हो
मान लिया मेरी साँसों रूकावट है
पर किसी के दिल में सजावट है

किसी रूप में एक स्वरूप देखा
किसी रात में एक चाँदनी देखा
एक परछाँई कुछ ऐसी दिखी
जिसके साथ रह जाऊं कुछ ऐसी दिखी

मेरे अंग की लहर तुझे सतायेगी
मेरे शरीर की लहर तुझे बतायेगी
चाँद भी कब? खिलेगा
इन्तजार भी कब? ढलेगा

हाथो की मेंहदी हाथों में रंगीन है
रूप का रंग आज अप्सरा में विलीन है


रचयिता:रामअवध


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