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भ्रष्टाचार

*कविता*

न्यान मांगने गया,तो अन्यान मिला
हक मांगने गया,तो हकदार मिला
जहाँ-जहाँ गया,वहाँ-वहाँ  मिला
भटक-भटक कर गया,अटक -अटक कर आया

कितने गिर चुके है लोग
कितने भ्रष्ट गये है लोग
देश इतना नम्र क्यों?
लोग इतने सब्र क्यों?

कौन? समझाये इन दानव को
कौन? बचाये इन दरिंदो को
बहन-बेटियाँ डर-डर कर चलती है
देश भी बच-बच कर चलता है

भेड़ियाँ की तरह शिकार करते है
जहाँ देखो वही प्रहार करते है
मत छोड़ो इन दरिंदों को
मत जन्म दो इन दरिंदो को

जहाँ देखो वही लूट है
जहाँ देखो वही  विमुक्त है
वादे नही चाहिए कामना चाहिए
बाते नही चाहिए कामना चाहिए

गरीबों को सताना बन्द करो
भ्रष्टाचार को भी बन्द करो
देश को बचाओ,संक्रलन में लाओ
विनाश को हटाओ, प्रगति को लाओ

रचयिता:रामअवध






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