छठ मईया के घाट जाना है,माथा वही झुकाना है


*कविता*

छठ घाट जाना है
माथा वहाँ झुकाना
सुरज उगे ,सिर मैं झुकाऊंगा
सुरज ढले, फिर भी सिर झुकाऊंगा

जल में रहकर अरग देना है
ठन्डे पानी में रहकर पर्व करना है
मनोकामना का करुणा हो ,मईया
छठ घाट का पर्व हो मईया

सुर्य उगे,ऐसा प्रतीक्षा करुँगा
मईया जागे,ऐसी प्रतिज्ञा करुँगा
पथ पर लोगों की जंजीर थी
घाट पर लोगों की भीड़ थी

घाट को सजा कर रखा हूँ ,मईया
भावनों को दबा कर रखा हूँ,मईया
 आपका आँचल  बड़ा प्यारा है
लोगों के लिए बड़ा न्यारा है

बड़े ही श्रद्धा के साथ आते है,लोग
बड़े ही अध्या  के साथ  आते है,लोग
बड़े प्यार से लोग करते है,पर्व
बड़े गर्व  से लोग पुकारते है,

रचयिता:रामअवध



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