चिपके रहेगें पेड़ो के साथ रहेगें

*कविता*

गरीबी के आँसू खुद ही पोछोगें
खुद का सहारा लेकर खुद ही चलेगें
किस्मत के आगे झुकेगें नही
लकीर के पीछे रहेगें नही

पेड़ो पर प्रहार को हम बचायेगें
पेड़ों का मौन दर्द हम बतायेगें
उसके गरीब रहकर हम दिखायेगें
उसकी दर्द की भाषा हम बतायेगें

विकास के साथ हत्या नही होने दूँगा
किसी पेड़ को यूँही नही कटने दूँगा
जीवन  उसके साथ बीताऊँगा
ऐसा प्रभाव लोगों पर दिखाऊँगा

हर खुशियाँ उसके साथ बाँटेगें
ऐसा प्यार उसके साथ दिखायेगें
पेड़ो से हम लोग चिपककर रहेगें
ऐसा वन बचाव हम लोग चलायेगें

रचयिता:रामअवध


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