मैं अब जागा हूँ

*कविता*

मैं अब जागा हूँ
वर्षों को त्यागा हूँ

वर्षों की माया हूँ
देश की छाया हूँ
अपने वक्त में लाया हूँ
कुदरत को पाया हूँ

समय ढलता जा रहा है
अंधेरा देखो आ रहा है
नया सवेरा आयेगा
अंधेरो को भागायेगा
नयी उम्मीद की नयी चाँद होगा
वक्त की लहरों में नयी पहचान होगा

खुशियों का ठिकाना ना रहेगा
यादों में बहाना ना रहेगा
समय में ठहराना ना रहेगा
खुद में कष्टाना ना रहेगा

संसार की महिमा देख पाया
बिजली की चमक पहचान पाया
भुमंडल की महक त्याग ना पाया
दूबों की नयी नमी में चमक पाया

रचयिता:रामअवध

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