वक्त के शिकन्जे में आकर रोया हूँ

*कविता*

मेरे वक्त की लकीर यही है
जग में मेरी तकदीर यही है

अंधेरे की आहट में रात भर जागना
सवेरे की किरणों नयी उम्मीद लेकर भागना
मौन गलियाँ भी कुछ कहती नही
लोगों की सनसनाहटे भी कुछ बोलती नही

शीतल हवाओं का भी सताना
कंबल की रूह में भी काँपना
जागे पलको में नींद का आना
वक्त के शिकन्जे में फँस कर रहना

वक्त के चौराये पर ये ज़माना देख रहा था
दुनियांँ कहाँ ? ये आसमान देख रहा था
परिंदो को उड़ते ये गगन देख रहा था
कतारों की रेखा ये जहान बता रहा थ

पल ठहरते हुए  देखा हूँ
उसकी यादों खोते हुए देखा हूँ
वक्त के शिकन्जे  में आकर रोया हूँ
रक्त में आकर ही सोया हूँ

छोटा सा माँ का भक्त हूँ मैं
उसी माँ का रक्त हूँ मैं

रचयिता:रामअवध

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