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कुछ सीखा हूँ

*कविता*

मैं तब हारूँगा, जब मेरी साँस निकल जायेगा
मैं तब-तक जागूँगा,जब-तक मैं सफल ना हो जाऊँ
मैं तब-तक पिछा नही छोडू़ँगा,जब-तक मैं पा ना जाऊँ
मैं तब-तक अंधेरे से टकराता रहूँगा,जब-तक उजाला ना मिल जाये

कुछ सीखना है ,अनुभव से सिखों
कुछ लिखना है,प्यार से लिखों
कुछ पाना है,कष्ट से सिखों
कुछ कहना है, दिल से कहों
कुछ बोलना है,प्यार से बोलों

विपत्तियाँ कुछ बताती है,सही राह सही द्वार दिखाती है
बीते हुए पल बताती है ,यादों में कुछ दिखाती है
समझ जाता हूँ उस बात को ,जो चेहरे पर दिख जाती है
लिख देता हूँ उस बात को ,जो दिल में बस जाती है

एक गुण होना चाहिए
जीवन में दिखाना चाहिए
जीवन में साहस होना चाहिए
उसे सहारे जीना चाहिए

परिंदे तब उड़ते है,जब गिरकर भी उड़ना सीखते है
लिखना तब सीखते है,जब कलम उठाना चाहते है
सँभलना तब सीखते है,जब ठोकर खाना सीखते है

कलम की नोक से कुछ लिखना चाहता हूँ
थोड़ा चैन ,थोड़ा बेचैन होना चाहता हूँ
कलम की नेक कुछ बताता है
किसके? सहारे सजाता है

आज मैं झुक गया हूँ,
कल उठ भी सकता हूँ
थोड़ा हलचल मचा दूँगा
थोड़ा पागल हो जाऊँगा

रचयिता:रामअवध

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