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धरती को बदल डाला हम लोगों ने

*कविता*

अंतर में अंतराल आया
वक्त में इकरार आया
यादों में प्रहार आया
दिल में अहसास आया

शहर को भाषण बना दिया
जहाँ देखो,वहाँ शासन बना दिया
विनाश को खुले पवन में लहरा दिया
जहाँ देखो,वहाँ जंजीर बना दिया

क्षिति को नरक बनाया ,हम लोगों ने
जगह-जगह पेड़ो को रुलाया ,हम लोगों ने
जग को प्रदूषणकारी बनाया ,हम लोगों ने
विकास को बुलाया,विनाश लाया हम लोगों ने
भु पर उर्वरक को लाया ,हम लोगों ने
स्वयं को हानि बनाया ,हम लोगों ने

राजनीति को रण बनाया ,हम लोगों ने
प्राकृतिक को छल बनाया ,हम लोगों ने
मन की शांति भागया ,हम लोगों ने
धरती बदल दिया ,हम लोगों ने

वक्त को पीछे लाओ
दर्पण को खिंच कर लाओ
देखों उन दृश्य को जो पहले थे
बदल गया दृश्य जो अब थे

अहसास होता है उन पलों को जो बीते पलों में याद आता हे
कहते है लोग गुज़र जाये पल ,वह नजर नही आता

भुमंडल में चादर ओंठे बैठी है
विष पवनों में आकर अंठी है
ना जाने किसके? सहारे ठिकी है


रचयिता:रामअवध




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