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क्या?पल था,कैसे? बताऊँ

*कविता*

खुला इंसान दिखी मुझे
खुले विचार की मिली मुझे

ना मैं जानता था
ना वह जानती थी
प्यार का नजरिया था
दोनों पास बुला लिया था

ऐसा लगा वर्षो से जानती हो
मुझे लगा मेरे करीब से गुजरती हो
हँस-हँस कर ,साथ रह-रह कर बोलती हो
हमेशा हँसकर मेरी बातों को मजाक बनाती हो

पहली बार ऐसी लड़की देखी थी
बार-बार उसका मुस्कान देखा  था
उसकी बातों में उसका उड़ान देखा था
उसके नयनों में मेरी चाहत देखी थी

पत्र -लिखा उसके यादों में
भेज दिया उसकी बातों में
जवाब में पत्थर का पहाड़ आया
दिल पर सीधा तीर का ज्वाला आया

नजरे छिपाती थी ,मुझे देखकर
पास जाने से,डरती मुझे देखकर
आँखों को मोड़ लेती थी,मुझे देखकर
राह बदल देती थी मुझे देखकर

उसके प्यार को वही छोड़ दिया
उसकी हवाले उसका नाम कर दिया
राह भी छोड़,खुद खो को छोड़ दिया
उसकी आँखों से,खुद को मोड़ दिया

रचयिता:रामअवध


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