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कविता तुम ही हो

*कविता*

साहस की नजरियाँ हमें क्यों? दिखाये हो
पुष्प की माला हमें क्यों? दिलाये हो
मेरी भावना को क्यों? नही समझ पाये हो
ये जग में हमें क्यो? भटका रही हो

मैं आज भी तुम्हें चाहता हूँ
लम्बे ख्वाबों में तुम्हें देखता हूँ
मान या मत मान तुम्हें ही चाहता हूँ
चाहत में तुम्हें ही बसा लिया हूँ

कहती हो,मुझे सही से जानती नही हो
वक्त मेरे साथ कभी गुजारती नही हो
ख्वाबों में हकीकत बन जाओ तुम
जीवन में मेरे साथ आ जाओ तुम

टूटे साँसे तक इकरार करता रहूँगा
तुम्हारी  में यादों बेकार बनकर रहूँगा
वक्त ढलता जायेगा पर इकरार नही
संसार बदल जायेगा पर तुम नही

दुरियाँ हमेशा यादों के लिए होती है
प्रेम हमेशा अमर के लिए होती है
वर्षों बीत गये,ज़माना भी ढल गये
यादें रह गये,मेरे पास आ नही पाये

तुम्हें पा नही सकता,तुम्हारी याद रख तो सकता हूँ
नाराजगी में नाराज मत हो,तुम्हारी याद में हूँ
समय मिले पुछ लेना,नही तो इकरारों में छोड़ देना
अगर ख्वाबों में नही हूँ ,ये जग में  मुझे छोड़ देना
अगर प्यार नही है,इस ज़माने में मुझे कह देना
अगर मैं रूकावट हूँ, तो आना ही छोड़ दूँगा

रचयिता:रामअवध

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