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विधाता की राग में जाना चाहता हूँ

*कविता*

जंगलों में रहकर सन्यासी बनूँगा
जीवन त्याग कर माया से दूर रहूँगा
प्रेम का जाल से हटना चाहता हूँ
आत्म में ही परमात्मा खोजता हूँ

विधाता के चरणों में रहना चाहता हूँ
उनकी ही माया में खोना चाहता हूँ
हर साँस में उनको ही पुकारता हूँ
हर वक्त में उन्हीं को याद करता हूँ

संसार की काल में घुलना नही चाहता हूँ
हर लोगों की जगह लेना नही चाहता हूँ
विधाता की शक्ति या भक्ति  में रहना चाहता हूँ
उनका की माया या विकराल रूप देखना चाहता हूँ

कौन?-सी राग होगी उनके पास,जो अनंत संसार घुमता होगा
कौन?-सा इकरार होगा उनके पास, जो प्रेम को जगाता होगा
कौन?-सा  रुप होगा उसके पास,जो विकराल दिखाता होगा
कौन?-सी माया होगा,जो विधाता रुप देखकर पाया होगा

रचयिता:रामअवध

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