कुदरत से मेरा नाता है

*कविता*

कुदरत से मेरा नाता है
जो मुझे पास बुलाता है
वही अम्बर,वही नजारा दिखाता है
वही धरती,वही सहारा बनाता है

खुले जीवन को जीने निकला हूँ
वक्त में घुमने निकला हूँ
खुले गुलशन को देखने निकला हूँ
खुले आसमान को छूने निकला हूँ
आस-पास को जानने निकला हूँ

यहाँ भी बसेरा है ,यहाँ डगेरा है
यहाँ भी सहारा है यहाँ भी वसेरा है

कभी चेहरा खिल जाता है
पेड़ों के साथ मिल जाता है
पल-भर यूँही गुजर जाता है
मन यही बस कर रह जाता है

तोड़ा सा अलग हूँ,बड़ा ही सरल हूँ
दिल का साफ हूँ,माँ का ही प्यार हूँ
तोड़ा सा बेचैन हूँ ,तोड़ा सा चैन हूँ
जिंदगी काल में हूँ,यही जहान पर हूँ

समय निकाल कर आया हूँ
कुछ को साथ लाया हूँ
कुदरत को बुलाया हूँ
साथ उसके रहा हूँ

दुनिया आगे,बढ़ गया
मैं वही,पथ पर रह गया
यही नभ पुकार लेता है
हमे कभी बुला लेता है

रचयिता:रामअवध

1 Comments

Unknown said…
Shreemaan, Atii sundar, manmohak panktiyaan.