कदम पर डग नही है चल रहा हूँ

*कविता*

कदम पर कदम नही चल सकता हूँ
ये ज़माना के बारे नही बता सकता हूँ
खुद को धोका भी  नही दे सकता हूँ
बिना लिखे रह भी नही सकता हूँ

हर सुबह कलम की नोक से लिख देता हूँ
दिल का स्नेह कलम में ही उतार देता हूँ
ख़्वाब में ख़्वाब ही बनकर लिख देता हूँ
दिल की बात पन्नों पर ही उतार देता हूँ

रुचि कहाँ? से आया मुझे समझ नही आया
लिख कैसे? देता हूँ,मैं समझ नही पाया
हर सुबह एक कविता लिखकर कैसे? आता हूँ
नया शब्द लेकर आता हूँ,पंक्तियां कैसे? बना लेता हूँ

सूरज की छिपते किरण को देखता हूँ
नयी चमक,नयी किरण आते देखता हूँ
तब? इस वक्त को सही से पहचानता हूँ
समय का चक्र  को नही पकड़ पाता हूँ
उसे करीब से होकर ही गुजर जाता हूँ

समय हमारा भी इम्तिहान लेता है
समय का कोई इम्तिहान नही ले पाता है
वक्त भी मानव को पहचान  लेता है
वक्त को हम ऐसे ही खत्म कर देते है

रचयिता:रामअवध



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