future

चलते है, काल के अतीत में

*कविता*

मानव अब शिकार होगा
संसार अब विनाश होगा
कुदरत अब नाराज होगा
दृश्य अब त्रिकाल होगा

जग अब डगमगायेगा
इंसान अब तड़पेंगा

देख रहा हूँ,मानव की चाल सें
खत्म कर रहे है,कुदरत की ढाल सें
सब विनाश हो रहा है,इंसान की काल सें
जीवन घट रहा है,इंसान की बनावटी सें

चलते है इतिहास के अतीत में
जीते थे,उस काल के व्यतीत में
वक्त को लाँग लेते थे,उस वक्त में
कुदरत को पहचान लेते थे,अहसास में

समय को समय में रहने देते थे
कुदरत को कुदरत में ढलने देते थे
कुदरत को गहरा प्यार मिलते थे
कुदरत में ही आसमान झुकते थे

अब लोग कुदरत को झुकाते है
अब ये आसमान को बताते है
नाराजगी ने कुदरत को सताया है
हम लोगों ने कुदरत को बचाया नही है


रचयिता:रामअवध


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