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संसार छोड़ेंगे, कहाँ? होंगे

*कविता*

 कुछ वर्षों तक ही साँस है ये
खुले पवन में ही वास है ये
छोटी सी जिन्दगी में भी है ये
सभी में विधाता  का निवास है ये

कदम-कदम पर संघर्ष है ये
आसमान में भी पतझड़ है ये
जीवन में भी सूखापन है ये
हरियाली की खोज भी है ये

मानव समस्या से डर जाते है
जीवन वही से रुक जाते है
नयी शक्ति बनकर निकलते है
यही जहान पर नक्षत्र देखते है

जीवन यही बीतकर जायेगी
वक्त यही पर रुककर जायेगी
संसार हमे छोड़कर जायेगी
ये साँस यही ठमकर जायेगी
संसार हमे भुलाकर जायेगी

हम यही पर राख हो जायेगें
सब कुछ भुल कर चले जायेगें
ना जाने किस? मोड़ पर आयेगें
अतीत को हम भुलकर आयेगें

जीवन से कुछ लेकर ना जायेगें
दुआ का वक्त साथ भी आयेगें
ईश्वर भी हमें स्वीकार करेगें
हम इनके चरण बनकर आयेगें
यही जहान पर हम लौटकर आयेगें
विधाता का चक्र यही हमें बतायेगें


रचयिता:रामअवध


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