मदहोश बना गया हूँ

*कविता*

नींद में चैन खो दिया हूँ
ठन्ड में होश खो दिया हूँ
होश में मदहोश बन गया हूँ
जीवन में बेरोजगार हो गया हूँ

ह्रदय की चाहत ही मेरी चाहत थी
कवि के अन्दर भी कविता ही थी
ह्रदय में चीख थी दिल में कोई बात थी
खुले आसमानों  रहना चाहती थी
जीवन की चीख से कही दूर जाना चाहती थी

जीवन में लोग वक्त  यूँ ही बीता  देते है
कष्ट से लोग यूँ ही डर कर भाग जाते है
मेहनत से हटकर लोग आराम खोजते है
संसार में लोग लोभ क्यों? बनकर आते है

किसी को पद मिल गया ,तो पद का घमंड
किसी को धन मिल गया तो धन का घमंड

पर हर कोई ऐसा नही होता है
जीवन उसका सफल होता है
हर संकट की पहचान रखता है
जीवन में ही उसका नाम होता है
हर पल नींद में खोया रहता है
ज़माने के पीछे हमेशा जाता है
वही से कुछ लेकर आता है
वही वक्त दोहरा लेता है

रचयिता:रामअवध

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