शंका में ही शक का संदेश आया

*कविता*

मर कर भी प्रेरणा बन जाऊँ
जी कर भी तमन्ना बन जाऊँ
हर लोग में स्नेह बनकर रह जाऊँ
मरने के बाद भी भाषा बन जाऊँ

जीवन की पीड़ा को भुला ना जाऊँ
संचारी भाव को कही छोड़ ना जाऊँ
अकाल जीवन में फँसकर रह ना जाऊँ
पाप की सागर में बसकर ना रह जाऊँ
खुले नेत्र में भी नेत्रहीन बनकर रह ना जाऊँ
चाहत इतनी थी,कविता का प्यार में ही रह जाऊँ

शंका का संदेश ऐसे आया, कविता के दिल में बस रह गयी
बातचीत का संदेश भी नही,चाहत पर तलवार बनकर आयी
मोहिनी की पलक नही, ज्वाला का प्रतिशोध बनकर आयी
सोचा लम्बी कहानी लिखूँ, शक का मोड़ वही से आ गयी

खुद में रहना सिखा गयी,यही ज़माने मुझे छोड़कर चली गयी
स्वयं को ही जीना सिखाया,उसने राह बताकर चली गयी
पर वह समझ नही पायी,मेरे साथ प्रीत जोड़कर नही गयी
ना ही प्रेम को समझ पायी,ना ही प्रेम का गुण देख पायी

मैं आज भी उसे मनाता हूँ, सब कुछ उस पर लुटाता हूँ
विधाता को बताता हूँ, उन्ही के सहारे रह पाता हूँ
मैं कुछ भी नही बना हूँ ,उसके प्रेम की माया घुल गया हूँ
मैं आज मर भी गया ,आत्मा बनकर तेरे पास रहूँगा
तेरी चेहरे की मुस्कान में ही प्यार बनकर ही जागूँगा

रचयिता:रामअवध


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