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क्यों? पहचान की बात करते हो

*कविता*

क्या? ऊँच-नीच की परख करते हो
ये जीवन में क्यों? व्याकूल रहते हो
क्यों?भेदभाव की भाषा सिखते हो
क्यों नहीं? वक्त को समझ पाते हो
क्यों? नही मानव को ही मानव समझ नही पाते हो
भेद का अंधकार में ही अंहकार दिखा देते हो

सरल दिल की भाषा माना करो
कभी किसी पर प्रहार मत करा करो
सुन्दर संसार को समझा करो
ईश्वर का ध्यान भी लगाया करो
ऊँची प्रेम ही बनकर रहा करो

ज्ञान की परिभाषा बताया करो
सभी में नयी उम्मीद जागाया करो
जीवन की प्रक्रिया उन्हें बताया करो
भविष्य का बादल उन्हें दिखाया करो
अकेला बैठकर ध्यान ही लगाया करो
वही वक्त बनकर वही खो जाया करो

ये संसार बड़ा ही व्यापन हैं
रंग-बिरंगों का जीवनयापन है
यही कुदरत की पहचान विलीन हैं
यही कुदरत की परिभाषा लीन हैं

कुदरत की माया में, कुदरत बन जाते है हम
संसार की शक्ति में ,संसार में आ जाते हैं हम
ऊँचे उम्मीद में ,ऊँची क्षितिज बन जाते है हम
करुणा की नगरी में,करुणा का जाल बन जाते है हम

रचयिता:रामअवध


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