क्रोध में डुबा हूँ

*कविता*

कुछ कहना है तो कह दो
अपनी बाते संक्षेप में बात दो
भाव को सही दिशा दिखा दो
मन की बात खुले मे ं कह दो
भला कहो या बुरा कहो पर कह दो

जग की भीड़ में विलुप्त हो जाऊँगा
कहाँ? ढूंढोगी मुझे मैं वही विलीन हो जाऊँगा
कहाँ? देखती हुई भागोगी,मै वही छिपकर रह जाऊंगा
कभी ना दिखूँगा ऐसा बनकर तुझे बताऊँगा

फिर मुझे ख्वाबों मे देखेगी
फिर नींद से जागकर रोयेगी
फिर खुद को ही दोष बतायेगी
फिर हर जगह याद तुझे सतायेगी

फिर ना मिली ऐसा वक्त आयेगा
जिंदगी में तु भागेगी ,फिर समझ में आयेगा
जिंदगी भी हर पल घुट-घुट कर जीयायेगी
फिर याद तुझे सतायेगा,पागल तुझे बनायेगा

मैं तेरी हालत पर रोऊँगा नही
जिंदगी में किसी को बताऊँगा नही
समय आने पर दिखाऊँगा नही
हर बात पर अहसास तुझे दिलाऊंगा नही

फिर देखकर घबारायेगी
फिर ना तु मेरे सामने नही आयेगी
सोचकर अतीत को भुलायेगी
फिर दर्द का भाव मुझे बतायेगी

फिर मेरे ख्यालो ं में डुबी रहेगी
फिर तु मेरे प्यार में जीयेगी
हर मोड़ पर मुझे याद करोगी
अपने दिल में मुझे प्रेम करेगी

फिर मुझे कविता याद आयेगी
फिर लौटकर तेरे पास आऊँगा
यूँही ना  छोड़ दूँगा तुझे
मरते हुए भी याद करूँगा तुझे

हर कष्ट से तुझे निकालूँगा
प्रेम करके तुझे बताऊँगा
फिर जीवन साथ बीताऊँगा
वन में रहकर दुनियां भुलाऊँगा
तेरे गोंद में रहकर विलीन हो जाऊँगा
कौन-सा? प्रेम में विलीन हो जाऊँगा

क्यों में डुबा हूँ,प्रेम से निकला हूँ

रचयिता:रामअवध

0 Comments