मत लड़ो,कुदरत से

*कविता*

कष्ट मत दो धरती को
स्वर्ग बनाओ जीवन को
जीवन का प्यास बुझाती है
स्वर्ग की महिमा दिखाती है

काँट रहे हो,वनो की धारा
लगा रहे हो,विकास की नारा
वस्त्र चीर रहे हो,धरती माँ की
खुद को वीर बता रहे हो,माँ की

वन उनकी शृंगार है
परिंदे उनकी प्यार है
पुष्प उनकी सुन्दरता है
नदियाँ उसकी प्यास है
मौसम उनकी आवास है

भूमिपुत्र की अभिलाषा मिटा रहे हो
खुद को नयी भविष्य बता रहे हो
कुदरत को कष्ट बना रहे  हो
प्रतिशोध अपना दिखा रहे हो

धरती माँ जागेगी
ज्वाला बनकर आयेगी
प्रतिशोध अपना दिखायेगी
विनाश की आवृत्ति लायेगी
उस पल तुझे बतायेगी
शरीर खत्म हो जायेगी
विनाश मिट ना पायेगी

रोक दो धरती पर अत्याचार
रोक दो वनो पर कटार
इन्हे भी प्रेम की भाषा आता है
इन्हे भी मानव से अभिलाषा है

यह धरती हमें मौका देती है
यही पर हम उसे धोका देते है

हरियाली देख रहे हो,धरती की देन है
किरण देख रहे हो,सूरज की देन है
साँस देख रहे हो,पवन की देन है
ये शरीर देख रहे हो,कुदरत की देन है
ये चिंगारी देख रहे हो,अग्नि की देन है

धरती कष्ट सह रही है
मौन होकर रह रही है

विकराल नेत्र खोलेगी
जलते हुए नजर आयेगी
उस समय कोई रोक ना पायेगा
कष्ट हम सब सह ना पायेगें

रचयिता:रामअवध




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